आदरणीय अनंतकृष्णन जी,
आपकी रचना "इंसाफ़ के स्वर" समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अन्याय और व्यवस्था की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती है। भाव स्पष्ट हैं और जन-सामान्य की पीड़ा को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करते हैं। विशेषकर "न्याय का स्वर चीख रहा है, चिल्ला रहा है" जैसी पंक्तियाँ रचना को मार्मिक बनाती हैं।
यदि आप चाहें, तो भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत कर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:
इंसाफ़ के स्वर
एस. अनंतकृष्णन
20-06-2026
इंसाफ़ के स्वर,
स्वर मात्र रह गए हैं,
व्यवहार में कहीं नहीं।
अस्पतालों में धन की लूट,
कोचिंग के नाम पर शोषण,
गरीब न्याय की आस लिए
न्यायालय का द्वार भी
नहीं खटखटा सकता।
जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र में रिश्वत,
जाति प्रमाणपत्र में भेदभाव,
एक ही घर के बच्चों को
अलग-अलग पहचान का उपहार।
न्याय का स्वर
चीखता है, चिल्लाता है,
पर सुनता कौन है?
चुनावों में अपराधियों का सम्मान,
मतदाताओं को धन का प्रलोभन,
सरकारी दफ्तरों में
रिश्वत का बढ़ता चलन।
न्याय का स्वर
फिर चीख रहा है,
फिर चिल्ला रहा है।
रिश्वत, भ्रष्टाचार,
पद, अधिकार और स्वार्थ—
सब मिलकर
इंसाफ़ का गला घोंट रहे हैं।
ठेकेदार की कच्ची सड़क
अन्याय की कहानी कहती है,
खुल्लमखुल्ला हो रहे अत्याचार पर
न्याय का स्वर
आज भी मौन खड़ा है।
न्याय के लिए जन-जन पुकारे,
पर इंसाफ़ का स्वर मौन है।
आपकी रचना सामाजिक चेतना जगाने वाली है। लिखते रहिए, आपकी लेखनी समाज के महत्वपूर्ण प्रश्नों को स्वर देती है।
सादर प्रणाम। 🙏🏻📖✍🏻
पारखी नज़र।
एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।
23-6-26.
++++++++-+++
"हीरे की परख जवहरी जाने"
पारखी नज़र न तो
न हीरे का मूल्य।
कबीर का एक दोहा है,
हीरा पड़ा बाज़ार में,
रहा छार लपटाय।
केतेहिं मूरख पचि मुये, कोइ पारखि लिया उठाय॥
पारखी न तो
कोई
विद्वत्ता का महत्व
जान नहीं सकता।
असली नकली सोने
चाँदी का महत्व
कसौटी पर कसकर देखने से ही
पता चलता है।
तमिल के प्रसिद्ध
ताड़ के पत्तों का साहित्य
उ.वे.स्वामिनाथय्यर
की खोज न तो
पता नहीं लगता।
पारखी नज़र न है तो
न होने चाँदी कोयले का पता।
न मोती का पता,न नवरत्नों का पता।
न काले
बाजारियों का पता।
न चोर डाकू खूनियों का पता।
न खजाना का पता।
पारखी नज़र न तो
न महाकाव्य
कामायनी का पता।
भाषा विज्ञान,
मनोविज्ञान
खगोल शास्त्र,
सिंह का चाल,
सियार की चालाकी
मीनलोचनी
अनेक
उपदेशात्मक ग्रंथ।
लोकोक्तियाँ
काव्य के रस छंद अलंकार
किसी वस्तु का पता नहीं।
हर बात की विशेषता,
विशिष्टता जानने
पारखी नज़र चाहिए।
आत्मज्ञानियों को पहचानने
आत्मविश्वास चाहिए।
अपने को पहचानने
अपनी अपनी क्षमता का पता लगाने
पारखी नज़र चाहिए।
रोगों के पहचान के लिए
नैदानिक परीक्षण चाहिए।